जॉन होल्ट बुक "स्कूल में आज तुमने क्या पूंछा ?" में मेरे विचार-------
क)
जॉन होल्ट बाल्यावस्था के तथ्य और बाल्यावस्था की
संस्था के बीच फर्क करते है कि बाल्यावस्था मानवीय जीवन की एक संस्था न होकर एक
तथ्य है| तथ्य और संस्था को उन्होंने अलग-अलग तरह से कहने का प्रयास किया है| तथ्य
से आशय जन्म के समय से तब तक का है जब तक मानव स्वयं पर निर्भर नही हो जाता है| जन्म
के समय हम जीने के लिए दूसरों पर निर्भर होते है| वे ही हमें खिलाते-पिलाते है,
हमें साफ़ रखते है, सभी खतरों से हमारी रक्षा करते है| हम अपनी असाहयता और दूसरोँ पर
निर्भरता की स्थिति से कुछ महीनों में नहीं निकल पाते| इस प्रक्रिया में सालों लग
जाते है| बचपन की
यह प्रक्रिया एक सच्चाई है| यह भी एक सच्चाई है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते है,
हम अपनी देखभाल स्वयं करने में भी अधिक सक्षम होते जाते हैं|
उन्होंने मानव जीवन
को एक वक्र रेखा के रूप में बताया है कि वह जनम से प्रारंभ होती है तथा शारीरिक,
मानसिक व सामाजिक क्षमताओ के शिखर तक उठती है| फिर कुछ समय तक पठार पर टिकती है|
और तब धीमे-धीमे वृद्धावस्था और मृत्यु की दिशा में नीचे उतरती
है| यह वक्र सतत बढ़त और परिवर्तन का है| यह विकास और बदलाव निरंतरता लिए हुए है| यह
एक एकल वक्र के रूप में होती है इसमें कोई टूटन नहीं होती है|
यहाँ
बाल्यावस्था का तथ्य समाप्त हो जाता है और उसका संस्थागत रूप प्रारंभ होता है| आज
जिसे हम बाल्यावस्था कहते हैं, वह जीवन वक्र की उस समग्रता को दो हिस्सों में काट
देती है| एक को हम बाल्यावस्था कहते है, तो दूसरे को व्यस्कावस्था| इससे मानव जीवन
में एक गहरी खाई खुद गई है| हम मानने लगे है कि इस खाई के दोनों ओर रहने वाले
बच्चे और वयस्क भिन्न-भिन्न हैं| हम यूँ व्यवहार करते है, मानो एक सोलह वर्षीय किशोर और एक बाईस वर्षीय युवक में जो
अंतर है, वह दो वर्षीय बालक और सोलह वर्षीय किशोर से कहीं अधिक है| और हम यह इसलिए
करते है क्योंकि जीवन के
महत्वपूर्ण विकल्पों के चयन के मामलो में एक सोलह वर्षीय किशोर कि स्थिति एक बाईस वर्षीय
युवक की तुलना में एक दो वर्षीय बालक के कहीं अधिक निकट है|
जॉन होल्ट कहते है
कि संस्थागत बाल्यावस्था उन दृष्टिकोणों, भावनाओं, रिवाजों तथा
नियमों से है जो एक बच्चे और उसके बुजुर्गो के बीच गहरी खाई खोदते है| इससे बच्चों
और युवाओ को अपने आस-पास के व्यापक समाज से सम्पर्क स्थापित करने में कठिनाई आती
है| इस कारण वे समाज में किसी प्रकार की सक्रिय जिम्मेदारी भी नहीं निभा पाते| इस
तरह हम उन्हें अठारह या उससे अधिक वर्षों के लिए अधीनता और निर्भरता में कैद कर
देते है और एक खर्चीली मुसीबत, नाजुक धरोहर तथा गुलाम व पालतू जीव का मिलाजुला रूप
दे देते है|
जॉन
होल्ट के बाल्यावस्था के तथ्य और बाल्यावस्था की संस्था के बीच फर्क को जहाँ तक
मैं समझ पाया हूँ वह यह है कि मानव जीवन के बढ़ने की जो प्रक्रिया है वो लगातार और
सामान रूप से बढती है यह एक ‘तथ्य’ है| ‘संस्था’ से आशय उन मान्यताओं, नियमों तथा
भावनाओं से है जो मानव जीवन के बढ़ने की प्रक्रिया पर अंतर करते है अर्थात एक बच्चे
और बुजुर्ग के बीच बाधाएँ खड़ी करते है|
ख)
“मैं जो करना चाहता हूँ वह है बाग़ को
घेरने वाली दीवार में एक दरवाज़ा या कुछ दरवाजे बानाना” एक शिक्षक के रूप
में बच्चों को उस बाग़ में एक दरवाजा या कुछ दरवाजे बनवाऊंगा जिससे जिन बच्चों को सुरक्षा का एहसास न होता हो या मदद न मिलती हो, बल्कि घुटन और अपनान
महसूस होता हो, वो कुछ समय के लिए बाहर निकल सकें, एक खुले और बड़े स्थान पर जीने
की कोशिश करें| अगर वो ऐसा न कर पाएं तो हमेशा वापस बाग़ में लौट सकें|
उदाहरण- के लिए उन्हें मौका देना जब बच्चे कुछ करना चाहता हो,
जो उन्हें पसंद हो, उसे करने देना| एक ऐसा माहौल देना जिससे बच्चे स्वतंत्र रूप से
निर्णय ले सकें|





