सोमवार, 25 दिसंबर 2017

जॉन होल्ट बुक "स्कूल में आज तुमने क्या पूंछा ?" में मेरे विचार-------


क)   जॉन होल्ट बाल्यावस्था के तथ्य और बाल्यावस्था की संस्था के बीच फर्क करते है कि बाल्यावस्था मानवीय जीवन की एक संस्था न होकर एक तथ्य है| तथ्य और संस्था को उन्होंने अलग-अलग तरह से कहने का प्रयास किया है| तथ्य से आशय जन्म के समय से तब तक का है जब तक मानव स्वयं पर निर्भर नही हो जाता है| जन्म के समय हम जीने के लिए दूसरों पर निर्भर होते है| वे ही हमें खिलाते-पिलाते है, हमें साफ़ रखते है, सभी खतरों से हमारी रक्षा  करते है| हम अपनी असाहयता और दूसरोँ पर निर्भरता की स्थिति से कुछ महीनों में नहीं निकल पाते| इस प्रक्रिया में सालों लग जाते है| बचपन की यह प्रक्रिया एक सच्चाई है| यह भी एक सच्चाई है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते है, हम अपनी देखभाल स्वयं करने में भी अधिक सक्षम होते जाते हैं|
उन्होंने मानव जीवन को एक वक्र रेखा के रूप में बताया है कि वह जनम से प्रारंभ होती है तथा शारीरिक, मानसिक व सामाजिक क्षमताओ के शिखर तक उठती है| फिर कुछ समय तक पठार पर टिकती है| और तब धीमे-धीमे वृद्धावस्था और मृत्यु की दिशा में नीचे उतरती है| यह वक्र सतत बढ़त और परिवर्तन का है| यह विकास और बदलाव निरंतरता लिए हुए है| यह एक एकल वक्र के रूप में होती है इसमें कोई टूटन नहीं होती है|
यहाँ बाल्यावस्था का तथ्य समाप्त हो जाता है और उसका संस्थागत रूप प्रारंभ होता है| आज जिसे हम बाल्यावस्था कहते हैं, वह जीवन वक्र की उस समग्रता को दो हिस्सों में काट देती है| एक को हम बाल्यावस्था कहते है, तो दूसरे को व्यस्कावस्था| इससे मानव जीवन में एक गहरी खाई खुद गई है| हम मानने लगे है कि इस खाई के दोनों ओर रहने वाले बच्चे और वयस्क भिन्न-भिन्न हैं| हम यूँ व्यवहार करते है, मानो एक सोलह वर्षीय किशोर और एक बाईस वर्षीय युवक में जो अंतर है, वह दो वर्षीय बालक और सोलह वर्षीय किशोर से कहीं अधिक है| और हम यह इसलिए करते है क्योंकि जीवन के महत्वपूर्ण विकल्पों के चयन के मामलो में एक सोलह वर्षीय किशोर कि स्थिति एक बाईस वर्षीय युवक की तुलना में एक दो वर्षीय बालक के कहीं अधिक निकट है|
जॉन होल्ट कहते है कि संस्थागत बाल्यावस्था उन दृष्टिकोणों, भावनाओं, रिवाजों तथा नियमों से है जो एक बच्चे और उसके बुजुर्गो के बीच गहरी खाई खोदते है| इससे बच्चों और युवाओ को अपने आस-पास के व्यापक समाज से सम्पर्क स्थापित करने में कठिनाई आती है| इस कारण वे समाज में किसी प्रकार की सक्रिय जिम्मेदारी भी नहीं निभा पाते| इस तरह हम उन्हें अठारह या उससे अधिक वर्षों के लिए अधीनता और निर्भरता में कैद कर देते है और एक खर्चीली मुसीबत, नाजुक धरोहर तथा गुलाम व पालतू जीव का मिलाजुला रूप दे देते है|
जॉन होल्ट के बाल्यावस्था के तथ्य और बाल्यावस्था की संस्था के बीच फर्क को जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ वह यह है कि मानव जीवन के बढ़ने की जो प्रक्रिया है वो लगातार और सामान रूप से बढती है यह एक ‘तथ्य’ है| ‘संस्था’ से आशय उन मान्यताओं, नियमों तथा भावनाओं से है जो मानव जीवन के बढ़ने की प्रक्रिया पर अंतर करते है अर्थात एक बच्चे और बुजुर्ग के बीच बाधाएँ खड़ी करते है|
ख)   मैं जो करना चाहता हूँ वह है बाग़ को घेरने वाली दीवार में एक दरवाज़ा या कुछ दरवाजे बानाना”  एक शिक्षक के रूप में बच्चों को उस बाग़ में एक दरवाजा या कुछ दरवाजे बनवाऊंगा जिससे जिन बच्चों को सुरक्षा का एहसास न होता हो या मदद न मिलती हो, बल्कि घुटन और अपनान महसूस होता हो, वो कुछ समय के लिए बाहर निकल सकें, एक खुले और बड़े स्थान पर जीने की कोशिश करें| अगर वो ऐसा न कर पाएं तो हमेशा वापस बाग़ में लौट सकें| 
उदाहरण- के लिए उन्हें मौका देना जब बच्चे कुछ करना चाहता हो, जो उन्हें पसंद हो, उसे करने देना| एक ऐसा माहौल देना जिससे बच्चे स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकें| 



गुरुवार, 6 नवंबर 2014

Masoori...

'जंगल से उठता धुंआँ' 'ऊँची-ऊँची पहाड़ियां'
'कल-कल झरने की आवाज' 'टिमटिमाती रोशनियां'
'सर्पीली सड़क' 'सड़क पर रेंगती गाड़ियां'
और 'गुजरते लोगों का शोर' 'मेरे कानो में फुसफुसाता है' 'फिर एक ऊँची आवाज कानो को भेदती हुई' 'आर-पार हो जाती है'-मुझे तन्हा कर देने के लिए बस इतना ही काफी है।--"आसिफ बेग"





शनिवार, 7 सितंबर 2013

"आस्था बनाम आसाराम "

एक तरफ तो आसाराम के गोरख धंधो की पोल खुल रही हैं और उसकी बेशर्मी का आलम देखिये की अब ये कह रहा हैं की रोज़ 2 घंटे मेरे पास मेरी महिला वैध्य यानी डॉक्टर को भेजो मुझे उसकी बहुत जरूरत हैं....

दूसरी तरफ जोधपुर पुलिस ने कई चौकाने वाले खुलासे किये हैं जैसे.. आसाराम सेक्स रैकेट चलाता था वो और उसका सेवादार शिवा ने कई महिलाओ के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जिसकी सीडी और विडियो क्लिप शिवा ने अहमदाबाद आश्रम में छुपा रखी हैं..जो अब पुलिस के हाथ लग चुकी है ....

अब बात करते है उन लोगो की जो  आसाराम जैसे ढोंगियों का पर्दाफाश करने से चिढ रहे हैं और उस कश्मीरी फर्जी पीर जैसे लोगो का उदाहरण दे रहे हैं की इसके बारे में बोलो तो मैं उनसे कहना चाहूँगा की जरूर हर समाज में पाखंडी और ढोंगी हैं लेकिन एक बार पाखण्डी का पाखण्ड जग जाहिर हो जाने के बाद कम से कम दुसरे धर्मो में और ख़ास तौर से इस्लाम में तो ऐसे पाखंडियो का अंजाम बहुत बूरा होता हैं.....उस फर्जी पीर का आज दिन तक एक भी मुस्लिम ने समर्थन नहीं किया किसी ने ये नहीं कहा की ये सोनिया और राहुल की चाल हैं....किसी मुस्लिम ने ये नहीं कहा की वो लडकिया पैसो में खरीदी गई इल्जाम लगाने के लिए और हां आसाराम और फर्जी पीर दोनों का जेल से छूटने के बाद समाज द्वारा व्यवहार देख लेना...उस फर्जी पीर को मुसलमान बोलाना पसन्द नहीं करेंगे....उसके पीछे नमाज़ पढना पसन्द नहीं करेंगे यहाँ तक की अगर मुस्लिमो का बस चले तो उसको शरियत के हिसाब से कड़ी सजा दे ताकि कोई ऐसा आगे नहीं कर सके....

जबकि आसाराम जिस दिन जेल से बहार आएगा देखना हिन्दू समाज का एक बड़ा समूह उस पर लगे सब आरोपों को दरकिनार करते हुए फिर से उसकी पूजा और गुणगान करने लग जाएगा.....उसकी चूर्ण से लेकर चटनी तक को भगवान का प्रसाद समझकर खरीदेगा....महिलाये और जवान लडकिया फिर से अकेले में आशीर्वाद लेने पहुँच जायेगी....क्योंकि भूतकाल में ऐसे बाबाओ पर इससे भी संगीन आरोप लगे खुले आम टीवी पर सेक्स करते पकडे गए लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से उनका कारोबार वैसे ही चलना शुरू होगया क्योंकि अगर ऐसो का कारोबार बंद होगा तो हिन्दू धर्म खतरे में आ जाएगा ऐसा प्रचार कर लोगो के मन में डर बिठा दिया गया हैं... 

गुरुवार, 13 जून 2013

Dost or dushman

लाख चाह लो कि न बने कोई किसी का दुश्मन, लेकिन इनसानी फितरत ही ऐसी होती है दुश्मन बन ही जाते है। कभी न कभी, कहीं न कहीं, किसी न किसी मोड़ पर आपको अपने दुश्मन मिल ही जायेंगे। कभी-कभी तो लोग दोस्त और दुश्मन में अंतर ही नही समझ पाते कि वह दोस्त है या दुश्मन। आज मेरे साथ ऐसा हादसा हुआ की मुझे शायर फराज की शायरी याद आती है "तेरे करीब आके बड़ी उलझन में हूँ, मै दोस्तों में हूँ कि मै तेरे दुश्मनों में हूँ " कुछ सनकी तो यह भी कहते है की अगर जिंदगी में कोई दुश्मन नही है  तो जीने का मजा नही है दोस्त बनाना आसान + काम है लेकिन दोस्ती निभाना कठिन काम है।
          खैर! खुदा बचाए दोस्तों को दुश्मन बनने से । में तो दोस्तों में ही इतना व्यस्त हूँ कि दुश्मनी के लिए वक्त ही नही है।...............

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

"न्याय व्यवस्था"

                                                            "न्याय व्यवस्था"
 प्रेम से वंचित होते समाज में 'इश्क वाला लव' के रास्ते की बाधा सरकार भी होगी। अब तक मोहब्बत के दुश्मन हिन्दुत्त्व के ठेकेदार, जाति-मजहब, पंचायतो के नियमो से चलने वाले संगठन थे। इतिहास गवाह है कि प्यार की शुरुआत  देखने से होती है। जितनी भी प्रेम आधारित प्रसिद्ध कथाये, उपन्यास है-देवदास, हीर-रांझा, लैला मजनू ये सभी इस डगर को कांटो भरा  बताती है। पर यौन हिंसा के खिलाफ बनाये गए नये कानून के कुछ प्रावधानों के मुताबिक प्यार की डगर हवालात ले जाएगा। पीछा किया तो कैद, एक टक देखा तो जेल!
                 फिल्म (हासिल-2003 )  का ये मशहूर गीत "आँखे भी होती है दिल की जुबां, बिन बोले कर देती है हालात ये पल में बयां" । उनकी भी अपनी भाषा होती है। कौन पड़ेगा इसे ?  
            अब क़ानून कह रहा है कि चौदह सेकेण्ड से ज्यादा किसी लड़की को देखा तो जेल जाओगे । ध्यान रहे ! दरोगा जी आपकी आँखों के प्रहरी होंगे। चचाजान! मिर्ज़ा ग़ालिब कहते है-'उनको देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक' अब होते तो कहते उनको देखे से लगता है जेल का डर!
           अगर घूर के देखने और पीछा करने का कानून अगर पहले बना होता तो , मै  और मेरे दोस्त (मै अपने दोस्तों का नाम नही लूँगा वो बुरा मान जायेंगे) कितनी बार जेल की हवा खा आते। में ही क्यों सुपर स्टार शाहरुख़ खान भी जेल में चक्की पीस रहे होते। गौरी खान का पीछा जो करते थे। 
             पर मै  इस क़ानून के ख़िलाफ नही हूँ । जिन परिस्थियों में ये कानून बना उनमे तो इससे भी सख्त कानून बनना चाहिए। लेकिन बाकी की जो धाराये है उनसे पुलिस को बेहिसाब अधिकार मिलेंगे जिनका बेजा इस्तेमाल होगा। कानून की ऐसी स्थिती पहले होती तो दुनिया की तमाम प्रेम कहानी जन्म न लेती। सोहनी-महिवाल, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट,सलीम-अनारकली। ख़ैर ! अल्लाह बचाये बेगुनाहों को क़ानून की मार से !

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

पश्चिमी सभ्यता भारतीयों पर असर

आज भारत बहुत तेजी से जवान हो रहा है। भारतीय युवाओं पर पश्चिमी सभ्यता का खुमार सर चढ़के बोल रहा है। वैसे परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर ऐसा परिवर्तन भारतीय सभ्यता को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। महानगरो में आज की नई पीढी की कुछ प्रकृतियो को गिना जा सकता है। विवाह से पहले शारीरिक संबंध का प्रचलन बड़ी तेज़ी से बढ़ा है। वैवाहिक बंधन आसानी से टूट रहे है। इसके भयावय परिणाम समाज को झेलने पड़ रहे है। शराब पीना लडकियों का अभद्र कपडे पहनना, क़र्ज़ लेकर ऐश करना, तेज़ म्युज़िक सुनना आदि पश्चिमी समाज में बुरा नहीं माना जाता है तो हम क्यों माने ? आधुनिक दिखने,  भद्र लगने के लिए जो हम कर सकते है | करे ! पीछे क्यों रहे ? वेलेंटाईन डे, क्रिसमस, न्यू ईयर पर उन्हें खुमारी  चढ़ती है लेकिन दिवाली, बसंतोत्सव, होली पर खुमारी नही चढ़ती। बसंतोत्सव से अपरिचित है लेकिन वेलेंटाईन डे से नही । क्यों कि वेलेंटाईन डे पश्चिमी  है।
              इन युवाओं को भारतीय होने पर गर्व नही है वे पश्चिमी सभ्यता की नक़ल करने में ही गर्व महसूस करते है। अगर ऐसा नहीं है तो में पूंछता हूँ कि 90  प्रतिशत से अधिक शहरी युवा जींस-टी शर्ट क्यों पहनते है ? उन्हें धोती-कुर्ता पर शर्म क्यों आती है? कोई पहनावा कैसा भी पहने उसमे कोई बुराई नहीं है लेकिन कोई अपने वास्तविक परिधान जो वातावरण के अनुकूल है, जो पारंपरिक भी है उसे ही टेडी निगाहों से देखे। कहाँ तक सही है । ठण्डे देशो में टाई, शराब, कोट पहने जाते है तो भारत जैसे गर्म देशो में ये नौटंकी करना कहाँ की दिमागदारी है|
     शराब और आधुनिकता का नही सबसे गंभीर समस्या तो भाषा की  है । आजादी के 65 साल बाद भी अंग्रेजी बोलने वाले को सम्मान की नजरो से जबकि हिन्दी बोलने वाले को हीन भावना से देखा जाता है । किसी को गुस्सा भी नही आता। कोई ऐसा आन्दोलन नही चला रहा जिससे भाषा, संस्कृति सही रास्ते पर आ जाये । ये कहना गलत होगा की पश्चिमीकरण पूरी तरह से गलत है। उनकी कुछ अच्छाईयों को अगर  नौजवान ग्रहण करे तो बेहतर होगा। उनके औधोगिक विकास तकनीकी विकास की नक़ल करे तो एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकते है तभी सही मायने में यंग  इण्डिया कहलायेगा । पश्चिमी देश तो उठ कर गिर रहे है परन्तु हम बिना उठे ही गिर रहे है ।.....

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

bachpan ki yaad


हम रहे या न रहे पर जिन्दगी के कुछ पल ऐसे होते है जिसे भुलाकर भी नही भुलाया जा सकता। बचपन में की गई बचकानी हरकतों को हमेशा याद रखेंगे । जैसे-  पढ़ते-पढ़ते बिस्तर पर सो जाने का.....
            टीचर के पढ़ाने पर कही खो जाने का.....
            क्लास पर दोस्तों से आई कांटेक्ट कर मन ही मन मुस्कुराने  का...
            क्लास में टीचर नही आने पर शोर करने का
            और टीचर के आते  ही  शांत हो जाने का.....
             इंटरवल पर पानी की टंकी के पास खड़े हो जाने का.....
             चलते-चलते अपने दोस्त को गिराने का.....
             स्कूल की छुट्टी होते ही चिल्लाते हुए भागने का......
            और फिर इन पलो को याद कर मन ही मन मुस्कुराने  का....asifbeg