पश्चिमी सभ्यता भारतीयों पर असर
आज भारत बहुत तेजी से जवान हो रहा है। भारतीय युवाओं पर पश्चिमी सभ्यता का खुमार सर चढ़के बोल रहा है। वैसे परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पर ऐसा परिवर्तन भारतीय सभ्यता को धीरे-धीरे खोखला कर रहा है। महानगरो में आज की नई पीढी की कुछ प्रकृतियो को गिना जा सकता है। विवाह से पहले शारीरिक संबंध का प्रचलन बड़ी तेज़ी से बढ़ा है। वैवाहिक बंधन आसानी से टूट रहे है। इसके भयावय परिणाम समाज को झेलने पड़ रहे है। शराब पीना लडकियों का अभद्र कपडे पहनना, क़र्ज़ लेकर ऐश करना, तेज़ म्युज़िक सुनना आदि पश्चिमी समाज में बुरा नहीं माना जाता है तो हम क्यों माने ? आधुनिक दिखने, भद्र लगने के लिए जो हम कर सकते है | करे ! पीछे क्यों रहे ? वेलेंटाईन डे, क्रिसमस, न्यू ईयर पर उन्हें खुमारी चढ़ती है लेकिन दिवाली, बसंतोत्सव, होली पर खुमारी नही चढ़ती। बसंतोत्सव से अपरिचित है लेकिन वेलेंटाईन डे से नही । क्यों कि वेलेंटाईन डे पश्चिमी है।
इन युवाओं को भारतीय होने पर गर्व नही है वे पश्चिमी सभ्यता की नक़ल करने में ही गर्व महसूस करते है। अगर ऐसा नहीं है तो में पूंछता हूँ कि 90 प्रतिशत से अधिक शहरी युवा जींस-टी शर्ट क्यों पहनते है ? उन्हें धोती-कुर्ता पर शर्म क्यों आती है? कोई पहनावा कैसा भी पहने उसमे कोई बुराई नहीं है लेकिन कोई अपने वास्तविक परिधान जो वातावरण के अनुकूल है, जो पारंपरिक भी है उसे ही टेडी निगाहों से देखे। कहाँ तक सही है । ठण्डे देशो में टाई, शराब, कोट पहने जाते है तो भारत जैसे गर्म देशो में ये नौटंकी करना कहाँ की दिमागदारी है|
शराब और आधुनिकता का नही सबसे गंभीर समस्या तो भाषा की है । आजादी के 65 साल बाद भी अंग्रेजी बोलने वाले को सम्मान की नजरो से जबकि हिन्दी बोलने वाले को हीन भावना से देखा जाता है । किसी को गुस्सा भी नही आता। कोई ऐसा आन्दोलन नही चला रहा जिससे भाषा, संस्कृति सही रास्ते पर आ जाये । ये कहना गलत होगा की पश्चिमीकरण पूरी तरह से गलत है। उनकी कुछ अच्छाईयों को अगर नौजवान ग्रहण करे तो बेहतर होगा। उनके औधोगिक विकास तकनीकी विकास की नक़ल करे तो एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकते है तभी सही मायने में यंग इण्डिया कहलायेगा । पश्चिमी देश तो उठ कर गिर रहे है परन्तु हम बिना उठे ही गिर रहे है ।.....
इन युवाओं को भारतीय होने पर गर्व नही है वे पश्चिमी सभ्यता की नक़ल करने में ही गर्व महसूस करते है। अगर ऐसा नहीं है तो में पूंछता हूँ कि 90 प्रतिशत से अधिक शहरी युवा जींस-टी शर्ट क्यों पहनते है ? उन्हें धोती-कुर्ता पर शर्म क्यों आती है? कोई पहनावा कैसा भी पहने उसमे कोई बुराई नहीं है लेकिन कोई अपने वास्तविक परिधान जो वातावरण के अनुकूल है, जो पारंपरिक भी है उसे ही टेडी निगाहों से देखे। कहाँ तक सही है । ठण्डे देशो में टाई, शराब, कोट पहने जाते है तो भारत जैसे गर्म देशो में ये नौटंकी करना कहाँ की दिमागदारी है|
शराब और आधुनिकता का नही सबसे गंभीर समस्या तो भाषा की है । आजादी के 65 साल बाद भी अंग्रेजी बोलने वाले को सम्मान की नजरो से जबकि हिन्दी बोलने वाले को हीन भावना से देखा जाता है । किसी को गुस्सा भी नही आता। कोई ऐसा आन्दोलन नही चला रहा जिससे भाषा, संस्कृति सही रास्ते पर आ जाये । ये कहना गलत होगा की पश्चिमीकरण पूरी तरह से गलत है। उनकी कुछ अच्छाईयों को अगर नौजवान ग्रहण करे तो बेहतर होगा। उनके औधोगिक विकास तकनीकी विकास की नक़ल करे तो एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकते है तभी सही मायने में यंग इण्डिया कहलायेगा । पश्चिमी देश तो उठ कर गिर रहे है परन्तु हम बिना उठे ही गिर रहे है ।.....


2 टिप्पणियाँ:
👌👌👌👌👌Bilkul sahi
thank you
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